12 Jyotirlingas in India: इन स्थानों पर भगवान शिव साक्षात् वास करते हैं

Rochak Rajasthan
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महादेव के 12 ज्योतिर्लिंग के पीछे छिपी है कई रोचक कथाएं, उनके बारे में जानें और दर्शन करने जरूर जाएं , जो की अलग-अलग जगह पर विद्यमान है |

महाकाल के चाहने वालों की इस दुनिया में कोई कमी नहीं है। शिवभक्तों के लिए यू तो देश में कई धाम है लेकिन प्रभु के 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना हर किसी की दिली इच्छा होती है। पुराणों के मुताबिक जो भी व्यक्ति भगवान शिव के इन 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर लेता है तो माना जाता है कि उसने अपना आध्यात्मिक जीवन सही से पूरा कर लिया है। माना जाता है कि प्रभु के देश में मौजूद 12 ज्योतिर्लिंग असाधारण है क्योंकि यहां खुद भगवान शिव ने दर्शन दिए थे। जिसके बाद ही ये सभी ज्योतिर्लिंग वहां उत्पन्न हुए। ज्योतिर्लिंग संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका हिंदी अर्थ होता है ‘रौशनी का प्रतीक।’ कई लोगों को आज भी प्रभु शिव के इन 12 ज्योतिर्लिंग के बारे में पूरी जानकारी नहीं है। इसलिए हम इस लेख में आपको इन सभी ज्योतिर्लिंग के बारे में विस्तार से बता रहे है…

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग [Somnath Jyotirling]

Somnath Shiv Jyotirling
Somnath Shiv Jyotirling

प्रभु महादेव का यह ज्योतिर्लिंग गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे स्तिथ है। इसे शिवभक्तों की श्रद्धा के सबसे बड़े केंद्रों में से एक माना जाता है। इस ज्योतिर्लिंग के सोमनाथ में उत्पन्न होने के पीछे एक रोचक कहानी है। बात उस समय की है जब चंद्र ने राजा दक्ष की सभी 27 बेटियों से विवाह किया था। इसके बावजूद वह सिर्फ अपनी पहली पत्नी रोहिणी को ही प्रेम किया करते थे। चंद्र की इस नजरअंदाजी की वजह से राजा दक्ष की सभी पुत्रियां काफी उदास रहने लगी थी। बेटियों की उदासी राजा दक्ष पर लंबे समय तक सहन हो ना सकी और उन्होंने क्रोध में आकर चंद्र को अपनी चमक खो देने का श्राप दे दिया। दक्ष के श्राप के प्रभाव की वजह से चंद्र अपनी चमक खो बैठे जिसकी वजह से पूरे ब्रह्मांड में अंधेरा-अंधेरा हो गया। ब्रह्मांड में उत्पन्न हुई इस कठिन परिस्तिथि की वजह से सभी देवता परेशान थे और उन्होंने दक्ष से चंद्र को माफ़ करने की प्रार्थना की। देवताओं की अपील पर दक्ष ने कहा कि यदि चंद्र महादेव की घोर तपस्या करें तो उन्हें उनका प्रकाश फिर से प्राप्त हो सकता है। इसके बाद चंद्र ने प्रभु महादेव की घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने चंद्र को उनका प्रकाश वापस लौटा दिया। जिसके बाद ही सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना इस जगह हुई और यह शिवभक्तों की आस्था का परम केंद्र बन गया।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग [Mallikarjum Jyotirling]

Mallikarjun Shiv Jyotirling
Mallikarjun Shiv Jyotirling

महादेव का यह ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी तट के पास श्री शैल पर्वत पर स्तिथ है। यह दक्षिण के कैलाश के नाम से भी विख्यात है। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के पीछे भी एक बड़ी रोचक कथा है। जिसके मुताबिक एक बार भगवान शिव और माता पार्वती अपने दोनों पुत्रों के विवाह को लेकर दुविधा में थे। दुविधा यह थी कि गणेश जी और कार्तिकेय में से सबसे पहले विवाह किसका किया जाए ? जब इस दुविधा का कोई हल नहीं निकलता दिखाई दिया तो एक रोचक प्रतियोगिता आयोजित की गई। प्रतियोगिता के मुताबिक जो भी पूरे ब्रह्मांड का सबसे पहले चक्कर लगाकर वापस आएगा उसी का सबसे पहले विवाह किया जायेगा। इस दौरान सभी की नजरें शिव पुत्रों कार्तिकेय और गणेश पर थी। एक तरफ कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर संपूर्ण धरती के चक्कर लगाने निकल पड़े। वही दूसरी तरफ गणेश जी ने अपनी बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल किया और सिर्फ अपने माता-पिता की परिक्रमा लगाई। दरअसल गणेश जी का मानना था कि उनके माता-पिता ही उनके लिए पूरे ब्रह्मांड के बराबर है इसलिए उनकी परिक्रमा करना मतलब पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाना। गणेश जी के बुद्धि-विवेक से प्रसन्न होकर शिव-पार्वती ने उनका विवाह विश्वरूपम की दोनों बेटियों रिद्धि और सिद्धि से करवा दिया। अपनी असफलता से कार्तिकेय काफी निराश हुए और जीवन पर्यन्त विवाह ना करने का फैसला कर श्री शैल पर्वत पर जाकर निवास करने चले गए। जिसके बाद पूर्णिमा के दिन माता पार्वती और अमावस्या के दिन पिता शिव पुत्र कार्तिकेय से मिलने शैल पर्वत पर पहुंचे। जिसके बाद ही मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति हुई।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग [Mahakaleshwar Jyotirling]

Mahakaleshwar Shiv Jyotirling
Mahakaleshwar Shiv Jyotirling

मध्यप्रदेश को भारत का दिल कहा जाता है और यही उज्जैन में पुण्य सलिला क्षिप्रा के तट के पास महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्तिथ है। रुद्र सागर झील के पास बना हुआ यह ज्योतिर्लिंग काफी चमत्कारी है। बात उस समय की है जब राजा चन्द्रसेन उज्जैन में राज किया करते थे। वह भगवान शिव के परम भक्त थे और उनकी प्रजा भी महादेव की अनंत भक्ति किया करती थी। एक बार दूसरे राज्य के राजा रिपुदमन ने मायावी राक्षस दूषण की मदद से उज्जैन पर हमला कर दिया। राक्षस दूषण ने उज्जैन की जनता को काफी परेशान किया और पूरे राज्य को तहस-नहस कर दिया। राज्य की विकट स्तिथि में वहां की जनता ने अपने आराध्य भगवान शिव की आराधना की और उनसे सहायता मांगी। पुराणों के मुताबिक उस वक्त प्रभु महादेव अपने भक्तों की पुकार पर प्रकट हुए और सभी की रक्षा की। जिसके बाद प्रभु महादेव ने हमेशा-हमेशा के लिए उज्जैन में अपना एक लिंग स्थापित कर दिया जिसे महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग कहा गया।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग [Omkareshwar Jyotirling]

Omkareshwar Shiv Jyotirling
Omkareshwar Shiv Jyotirling

मध्यप्रदेश में स्तिथ यह दूसरा ज्योतिर्लिंग है जिसे शिवभक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र माना गया है। ओंकारेश्वर-ज्योतिर्लिंग का मंदिर मान्धाता-पर्वत पर स्थित है। नर्मदा नदी के पास शिवपुरी द्वीप पर विराजमान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना के पीछे की भी एक कहानी है। बात उस समय की है जब देवताओं और दानवों के बीच बड़ा संग्राम हुआ, जिसमें दानवों ने देवताओं पर विजय हासिल कर ली। अपनी पराजय पर त्राहिमाम करते हुए सभी देवता भगवान भोले-भंडारी के पास सहायता के लिए पहुंचे। उनकी पुकार सुनकर भोलेनाथ युद्ध मैदान पर आये और दानवों का संहार कर दिया। यह जगह ‘मान्धाता-पर्वत’ पर थी और प्रभु महादेव के यहां प्रकट होने और दानवों पर विजयी होने की वजह से यहां ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति हुई। यह जगह आज आस्था का बड़ा केंद्र है।

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग [Vaidhnath Jyotirling]

Vaidhnath Shiv Jyotirling
Vaidhnath Shiv Jyotirling

झारखंड में स्तिथ भगवान शिव के इस लिंग को ‘मनोकामना लिंग’ भी कहा जाता है। इसका सीधा संबंध लंकापति रावण की एक पौराणिक कथा से जुड़ा है। रावण को प्रभु महादेव का बड़ा भक्त कहा जाता था। अपनी मां के कहने पर रावण ने महादेव को लंका में हमेशा के लिए स्थापित करवाने का निश्चय किया। इसके लिए उसने हिमालय पर जाकर घोर तपस्या की और महादेव को खुश करने के लिए अपने बारी-बारी से अपने नौं सर प्रभु को अर्पित कर दिए। दशानन के नाम से मशहूर रहे रावण की इस कठोर तपस्या से प्रभु महादेव प्रसन्न हुए और वहां प्रकट हुए। महादेव ने रावण से मनवांछित वरदान मांगने को कहा। ऐसे में रावण ने महादेव से हमेशा हमेशा के लिए उसकी लंकानगरी चलने की इच्छा व्यक्त की। महादेव मजबूर थे और उन्होंने रावण की प्रार्थना स्वीकार कर ली। महादेव ने स्वयं को लिंग के रूप में प्रकट किया और रावण के समक्ष शर्त रखी कि, वह इस लिंग को लंका चलने तक कही भी धरती पर नहीं रखे। यदि उसने ऐसा किया तो वह शिवलिंग वही स्थापित हो जाएगा। रावण महादेव की इस शर्त को स्वीकार कर उनके लिंग को लेकर लंका की तरफ चल पड़ा। सभी देवतागण चिंतित थे कि यदि महादेव लंका में स्थापित हो गए तो कैलाश हमेशा के लिए खाली हो जायेगा। ऐसे में सभी ने भगवान त्रिलोकीनाथ विष्णु से सहायता की गुहार लगाई। इसके बाद विष्णु ने लीला रची और बीच रस्ते में रावण को लघुशंका आई। ऐसी स्तिथि में रावण ने न चाहते हुए भी लिंग को एक ग्वाले को पकड़ा दिया। लेकिन ग्वाला शिवलिंग के वजन को झेलने में असमर्थ रहा और उसने उसे जमीन पर रख दिया। जिसके बाद वह ज्योतिर्लिंग वही स्थापित हो गया। कहा जाता है कि ग्वाले के रूप में स्वयं भगवान विष्णु थे जो रावण को शिवलिंग लंका में स्थापित करने से रोकने के लिए वहां प्रकट हुए और लीला रची।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग [Bhima Shankar Jyotirling]

Bhima Shankar Shiv Jyotirling
Bhima Shankar Shiv Jyotirling

शिवपुराण में ‘भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग’ के बारे में आपको विस्तार से जानकारी मिलती है। पुणे के शहाद्रि इलाके में स्थित यह ज्योतिर्लिंग एक रोचक पौराणिक कथा का वर्णन करता है। बात सतयुग की है और यह कथा रावण के भाई कुम्भकर्ण के पुत्र भीम से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब भीम को पता चला कि उसके पिता को प्रभु राम ने मौत दी है तो उसने राम से प्रतिशोध लेने का मन बनाया। इसके लिए उसने सृष्टि रचियता ब्रम्हा की घोर तपस्या की और और उनसे वरदान में कई दिव्य शक्तियां प्राप्त कर ली। जिसके बाद उसका अत्याचार धरती पर बढ़ता गया। इस दौरान उसने शिवभक्तों पर भी काफी अत्याचार किये, जिसे देखकर महादेव क्रोधित हो गये और स्वयं भीम से युद्ध लड़ा और विजय प्राप्त की। महादेव की विजयगाथा से प्रसन्न होकर सभी देवतागण ने प्रभु से उसी जगह स्थापित रहने की विनती की, जिसे मानकर महादेव वहां ‘भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग’ के नाम से स्थापित हुए। युद्ध के दौरान भगवान शिव के पसीने की बूंद जमीन पर गिरी जिससे ‘भीमा नदी’ उत्पन्न हुई जो आज भी बहती है। भीमा नदी दक्षिण भारत की प्रमुख नदी है जिसे भीमरथी नदी के नाम से भी जाना जाता है।

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग [Rameshwaram Jyotirling]

भगवान शिव का यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग की कथा रामायण काल से जुड़ी हुई है। बात उस समय की है जब भगवान राम अपनी पत्नी सीता की खोज में रामेश्वरम पहुंचे थे और कुछ समय के लिए वहां विश्राम किया। इस दौरान वह नदी के समीप जलपान करने पहुंचे तो एक आकाशवाणी हुई और उन्हें जल उनकी इजाजत के बिना ना पीने की चेतावनी मिली। जिसके बाद राम भगवान ने वहां अपने आराध्य महादेव का शिवलिंग बनाया और उसकी पूजा-अर्चना की। जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें रावण पर विजय का वरदान दिया। जो शिवलिंग भगवान राम ने बनाया था उसे आज रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। यह शिवभक्तों की आस्था का परम केंद्र है, यहां आकर महादेव से जो मांगो वह मिल जाता है।

Rameshwaram Shiv Jyotirling
Rameshwaram Shiv Jyotirling

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग [ Rameshwaram Shiv Jyotirling ]

Graneshwar Shiv Jyotirling
Graneshwar Shiv Jyotirling

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में विराजमान ‘घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग’ का इतिहास काफी पुराना है। माना जाता है कि एक समय सुर्धम और सुदेशा नाम का एक विवाहित जोड़ा था जिसके कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए सुदेशा ने अपने ही पति का दूसरा विवाह अपनी ही बहन ‘घूश्म’ से करवा दिया। इस शादी के बाद एक प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ। लेकिन सुदेशा इस बात से नाखुश था और उसने बालक को उस झील में फेंक दिया जहां पर सुर्धम ने 101 शिवलिंग प्रभु को अर्पित किये थे। जब सुर्धम को इस बात की जानकारी मिली तो उसने महादेव की आराधना की और अपने पुत्र को वापस देने की मांग की। सुर्धम से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे उसका पुत्र लौटा दिया और उसके कहने पर उसके पति सुदेशा को भी क्षमादान दिया। और स्वयं महादेव वहां घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग [Nageshwar Jyotirling]

Nageshwar Shiv Jyotirling
Nageshwar Shiv Jyotirling

भगवान महादेव उत्तर प्रदेश की कृष्ण नगरी द्वारका में ‘नागेश्वर ज्योतिर्लिंग’ के रूप में विराजमान है। कहा जाता है कि महादेव का यह शिवलिंग हर प्रकार के विष से सुरक्षित है। बात उस समय की है जब द्वारका में रहने वाले शिवभक्त सुप्रिया को दारुका नाम के एक राक्षस ने अपने कब्जे में ले लिया। साथ ही उसने राज्य की सभी महिलाओं को भी अपना बंदी बना लिया। दारुका के अत्याचारों से प्रताड़ित हो रहे लोगों ने शिवभक्त सुप्रिया के कहने पर महादेव के मन्त्र ‘ओम नमः शिवाय’ का जाप किया। ऐसे में महादेव ने प्रकट होकर पापी राक्षस दारुका का अंत किया और स्वयं वहां नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग [Kashi Vishwanath Jyotirling]

Kashi Vishwanath Shiv Jyotirling
Kashi Vishwanath Shiv Jyotirling

उत्तरप्रदेश के वाराणसी में गंगा नदी की घाटों के समीप प्रभु महादेव ‘काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग’ के रूप में भक्तों की आस्था का केंद्र बने हुए है। माना जाता है जो भी व्यक्ति अपने जीवन की अंतिम साँसे यहां लेता है तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस ज्योतिर्लिंग के संबंध में प्रचलित कथा के मुताबिक एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच ‘कौन सर्वश्रेष्ठ है?’ इस बात को लेकर विवाद छिड़ गया। तभी समस्या के समाधान के लिए भोलेनाथ वहां लिंग के रूप में प्रकट हुए और दोनों ने लिंग का छोर ढूढ़ने के लिए कहा। साथ ही शर्त रखी कि जो भी लिंग का छोर सबसे पहले ढूढ़ेगा वही सर्वश्रेष्ठ होगा। कुछ समय बाद दोनों ही बारी-बारी से वापस असफलता के साथ लौटे। विष्णु जी ने अपनी हार स्वीकार कर ली लेकिन ब्रह्मा जी ने झूठ बोला कि उन्होंने लिंग के छोर को पता लगा लिया है। उनके इस झूठ पर महादेव क्रोधित हुए और गुस्से में उनका एक सर धड़ से अलग कर दिया। बाद में महादेव वहां काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग [Trimbakeshwar Jyotirling]

Trimbakeshwar Shiv Jyotirling
Trimbakeshwar Shiv Jyotirling

महाराष्ट्र के नासिक जिले में महादेव का त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग स्तिथ है। कहा जाता है कि त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की वजह से ही गोदावरी नदी का अस्तित्व है। शिवपुराण में एक कथा है जिसके मुताबिक गौतम ऋषि को भगवान वरुण से वरदान प्राप्त था कि, उनके यहां कभी अन्न-धान की कमी नहीं होगी। ऋषि को प्राप्त वरदान से अन्य देवता खुश नहीं हुए। जिसके कारण उन्होंने ऋषि के अन्न-धान पर एक गाय को छोड़ दिया और ऋषि ने यह देख गाय का अंत कर दिया। तत्पश्चात ऋषि गौतम को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने महादेव की आराधना की। ऋषि की प्रार्थना को महादेव ने स्वीकार किया और माता गंगा से ऋषि के नगर से होकर बहने के लिए कहा ताकि उनके तमाम पाप धूल जाए। इसके बाद महादेव स्वयं वहां त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग [Kedarnath Jyotirling]

Kedarnath Shiv Jyotirling
Kedarnath Shiv Jyotirling

कलयुग में लोग चार धाम की यात्रा करते है उनमें से एक है केदारनाथ। माना जाता है कि भगवान शिव यहां स्वयं केदारनाथ के रूप में निवास करते है। मान्यता के अनुरूप यहां आने वाले हर व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है। केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना के पीछे एक प्रचलित पौराणिक कथा है। जिक्से अनुसार भगवान ब्रह्मा के नर और नरायन नाम के दो पुत्र हुआ करते थे। दोनों ने द्वापर युग में कृष्ण और अर्जुन के रूप में जन्म लिया था और दोनों ही महादेव के बड़े भक्त थे। एक बार दोनों ने मिलकर बद्रीनाथ में भगवान महादेव का शिवलिंग बनाया और उसकी प्रतिदिन पूजा-अर्चना करने लगे। कहा जाता है कि महादेव रोजाना उन्हें दर्शन दिया करते थे। एक दिन दोनों ने महादेव से उस स्थान पर हमेशा के लिए स्थापित होने का आग्रह किया। जिसके बाद महादेव केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में वही निवास करने लगे। आज भी केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की बहुत महत्वतता मानी जाती है। 

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