Rajasthan’s Famous Battle and Self-Immolation: Short Narration

Rochak Rajasthan
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राजस्थान की प्रसिद्ध लड़ाई और जौहर: लघु कथन

चित्तौड़ दुर्ग

Rajasthan's Famous Battle and Self-Immolation: Short Narration 1
सबसे ज़्यादा लड़ाइयों वाला किला: चित्तौरगढ़

चित्तौड़ प्रथम साका सन् 1303 में हुआ जब दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्बोर विजय के बाद चित्तौड़ को आक्रांत किया | अलाउद्दीन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा तथा राणा रतन सिंह की अनिंद्य सुंदरी रानी पधमिनी पाने की लालसा हमले का कारण बनी |

दूसरा साका सन् 1534 में हुआ जब गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने एक विशाल सेना के साथ चित्तौड़ गढ़ पर हमला किया | राजमाता हाड़ी कर्मवती और दुर्ग की सैंकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर का अनुष्ठान कर अपने प्राणों की आहूति दी |

चित्तौड़गढ़ का साका सन् 1576 में हुआ जब मुग़ल बादशाह अकबर ने राणा उदय सिंह के शासन काल में चित्तौड़ पर ज़ोरदार आक्रमण किया | यह साका जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया के नेतृत्व में योद्धाओं के पराक्रम तथा दुर्गस्थ ललनाओं जौहर और बलिदान प्रसिद्ध है |

जैसलमेर दुर्ग

Jaisalmer
Jaisalmer

जैसलमेर का पहला साका उस समय हुआ जब दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने विशाल सेना के साथ आक्रमण कर दुर्ग को घेर लिया | इस में भाटी शासक रावल मूलराज, कुंवर रतन सिंह अगणित योद्धाओं ने असिधारा में स्नान किया तथा वीरांगनाओं ने जौहर का अनुष्ठान किया |

दूसरा साका फ़िरोज़शाह तुग़लक़ के शासनकाल के प्रारम्भिक वर्षों में हुआ | रावल, दूदा, त्रिलोकसी व अन्य भाटी सरदारों और योद्धाओं ने शत्रु सेना से लड़ते हुए वीरगति पाई एवम दुर्गस्थ वीरांगनाओं ने जौहर किया |

जैसलमेर का तीसरा साका अर्ध साका कहलाता है | कारण इस में वीरों ने केसरिया तो किया लेकिन जौहर नहीं हुआ | अतः इसे आधा साका ही माना जाता है

रणथम्बोर दुर्ग

रणथम्बोर का प्रसिद्ध साका 1301 ई. में हुआ जब वहां के पराक्रमी शासक राव हम्मीर देव चौहान ने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मद शाह को अपने यहाँ शरण प्रदान की जिसे दंडित करने तथा अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा की पूर्ती हेतु रणथम्बोर पर एक विशाल सेना के साथ ज़ोरदार आक्रमण किया | शरणागत वत्सलता के आदर्श और अपनी आन की रक्षा करते हुए अपने विशवस्त योद्धाओं सहित वीरगति प्राप्त की तथा रानियों व दुर्ग की वीर नारियों ने जौहर का अनुष्ठान किया |

गागरोण दुर्ग

गागरोण का पहला साका सन् 1423 ई. में हुआ जब वहां के पराक्रमी शासक अचलदास खींची के शासन काल में माण्डू के सुलतान होशंगशाह ने आक्रमण किया | फलतः भीषण संग्राम हुआ जिस में अचलदास ने अपने बंधू बांधवों और योद्धाओं सहित शत्रु से जूझते हुए वीरगति प्राप्त की तथा उस की रानियों व दुर्ग की अन्य ललनाओं ने अपने जौहर की ज्वाला में होम दिया |

गागरोण का दूसरा साका सन् 1444 में हुआ जब माण्डू के सुलतान महमूद खिलजी ने एक विशाल सेना के साथ गागरोण दुर्ग पर आक्रमण किया | उस समय पाल्हणसी वहाँ का शासक था |

जालौर दुर्ग

जालौर का प्रसिद्ध साका सन् 1311 – 1312 ई. में हुआ जब सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर आक्रमण किया | जालौर के पराक्रमी शासक कान्हड़देव सोनगरा (चौहान) और उस के पुत्र वीरम देव के त्याग और बलिदान तथा वीरांगनाओं के जौहर की घटना ने इसे इतिहास में प्रसिद्धि दिलाई |

सिवाणा दुर्ग

सिवाणा का पहला साका सन् 1310 ई. में हुआ जब वीर सातलदेव और सोम (सोमेश्वर) ने अलाउद्दीन के भीषण आक्रमण का प्रतिरोध करते हुआ प्राणोत्सर्ग किया तथा वीरांगनाओं ने जौहर की ज्वाला प्रज्ज्वलित की | विजय के बाद दुर्ग का नाम खैराबाद रखा गया |

दूसरा साका मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल में हुआ जब मोटा राजा उदय सिंह ने शाही सेना की सहायता से सिवाणा दुर्ग पर आक्रमण किया | वहां के वीर और स्वाभिमानी शासक कल्ला राठौर ने भीषण युद्ध करते हुए वीरगति पाई और दुर्ग की नारियों ने जौहर का अनुष्ठान किया |

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